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Astrology


नवग्रह सर्व ग्रह पीड़ा निवारण


सूर्य
1 सूर्य को बली बनाने के लिए व्यक्ति को प्रातःकाल सूर्योदय के समय उठकर लाल पूष्प वाले पौधों एवं वृक्षों को जल से सींचना चाहिए ।
2 रात्रि में ताँबे के पात्र में जल भरकर सिरहाने रख दें तथा दूसरे दिन प्रातःकाल उसे पीना चाहिए।
3 ताँबे का कड़ा दाहिने हाथ में धारण किया जा सकता है।
4 लाल गाय को रविवार के दिन दोपहर के समय दोनों हाथों में गेहूँ भरकर खिलाने चाहिए।
5 गेहूँ को जमीन पर नहीं डालना चाहिए।
6 किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्य पर जाते समय घर से मीठी वस्तु खाकर निकलना चाहिए।
7 हाथ में मोली (कलावा) छः बार लपेटकर बाँधना चाहिए।
8 लाल चन्दन को घिसकर स्नान के जल में डालना चाहिए।
सूर्य के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु रविवार का दिन, सूर्य के नक्षत्र (कृत्तिका, उत्तरा-फाल्गुनी तथा उत्तराषाढ़ा) तथा सूर्य की होरा में अधिक शुभ होते है।
चन्द्रमा
1 व्यक्ति को देर रात्रि तक नहीं जागना चाहिए।
2 रात्रि के समय घूमने-फिरने तथा यात्रा से बचना चाहिए।
3 रात्रि में ऐसे स्थान पर सोना चाहिए जहाँ पर चन्द्रमा की रोशनी आती हो।
4 ऐसे व्यक्ति के घर में दूषित जल का संग्रह नहीं होना चाहिए।
5 वर्षा का पानी काँच की बोतल में भरकर घर में रखना चाहिए।
6 वर्ष में एक बार किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान अवश्य करना चाहिए। सोमवार के दिन मीठा दूध नही खाना चाहिए।
7 सफेद सुगंधित पुष्प वाले पौधे घर में लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
8 चन्द्रमा के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु सोमवार का दिन, चन्द्रमा के नक्षत्र (रोहिणी, हस्त तथा श्रवण) तथा चन्द्रमा की होरा में अधिक शुभ होते है।
मंगल
1 लाल कपड़े में सौंफ बाँधकर अपने शयनकक्ष में रखनी चाहिए।
2 ऐसा व्यक्ति जब भी अपना घर बनवाये तो उसे घर में लाल पत्थर अवश्य लगवाना चाहिए।
3 बन्धुजनों को मिष्ठान्न का सेवन कराने से भी मंगल शुभ बनता है।
4 लाल वस्त्र लिकर उसमें दो मुठ्ठी मसूर की दाल बाँधकर मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दान करनी चाहिय।
5 मंगलवार के दिन हनुमानजी के चरण से सिन्दूर लिकर उसका टीका माथे पर लगाना चाहिए।
6 बंदरों को गुड़ और चने खिलाने चाहिए।
7 अपने घर में लाल पुष्प वाले पौधे या वृक्ष लगाकर उनकी देखभाल करनी चाहिए।
8 मंगल के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, मंगल के नक्षत्र (मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा) तथा मंगल की होरा में अधिक शुभ होते है।
बुध
1 अपने घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए तथा निरन्तर उसकी देखभाल करनी चाहिए।
2 बुधवार के दिन तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए।
3 बुधवार के दिन हरे रंग की चूड़ियाँ हिजड़े को दान करनी चाहिए।
4 हरी सब्जियाँ एवं हरा चारा गाय को खिलाना चाहिए।
5 बुधवार के दिन गणेशजी के मंदिर में मूँग के लड्डुओं का भोग लगाएँ तथा बच्चों को बाँटें।
6 घर में खंडित एवं फटी हुई धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ नहीं रखने चाहिए।
7 अपने घर में कंटीले पौधे, झाड़ियाँ एवं वृक्ष नहीं लगाने चाहिए।
8 फलदार पौधे लगाने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
9 तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।
10 बुध के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु बुधवार का दिन, बुध के नक्षत्र (आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती) तथा बुध की होरा में अधिक शुभ होते।
गुरु
1 ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए।
2 सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए।
3 ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर निःशुल्क सेवा करनी चाहिए।
4 किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए।
5 ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए।
6 गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए।
7 गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए।
8 गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते है।
शुक्र
1 काली चींटियों को चीनी खिलानी चाहिए।
2 शुक्रवार के दिन सफेद गाय को आटा खिलाना चाहिए।
3 किसी काने व्यक्ति को सफेद वस्त्र एवं सफेद मिष्ठान्न का दान करना चाहिए।
4 किसी महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए जाते समय 10 वर्ष से कम आयु की कन्या का चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए।
5 अपने घर में सफेद पत्थर लगवाना चाहिए।
6 किसी कन्या के विवाह में कन्यादान का अवसर मिले तो अवश्य स्वीकारना चाहिए।
7 शुक्रवार के दिन गौ-दुग्ध से स्नान करना चाहिए।
8 शुक्र के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शुक्रवार का दिन, शुक्र के नक्षत्र (भरणी, पूर्वा-फाल्गुनी, पुर्वाषाढ़ा) तथा शुक्र की होरा में अधिक शुभ होते है।
शनि
1 शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल्ली के तेल का दीपक जलाएँ।
2 शनिवार के दिन लोहे, चमड़े, लकड़ी की वस्तुएँ एवं किसी भी प्रकार का तेल नहीं खरीदना चाहिए।
3 शनिवार के दिन बाल एवं दाढ़ी-मूँछ नही कटवाने चाहिए
भिखारी को कड़वे तेल का दान करना चाहिए।
4 भिखारी को उड़द की दाल की कचोरी खिलानी चाहिए।
5 किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू अपने हाथों से पोंछने चाहिए।
घर में काला पत्थर लगवाना चाहिए।
6 शनि के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा, उत्तरा-भाद्रपद) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते हैं।
राहु
1 ऐसे व्यक्ति को अष्टधातु का कड़ा दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए।
2 हाथी दाँत का लाकेट गले में धारण करना चाहिए।
3 अपने पास सफेद चन्दन अवश्य रखना चाहिए।
4 सफेद चन्दन की माला भी धारण की जा सकती है।
5 जमादार को तम्बाकू का दान करना चाहिए।
6 दिन के संधिकाल में अर्थात् सूर्योदय या सूर्यास्त के समय कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नही करना चाहिए।
7 यदि किसी अन्य व्यक्ति के पास रुपया अटक गया हो, तो प्रातःकाल पक्षियों को दाना चुगाना चाहिए।
8 झुठी कसम नही खानी चाहिए।
9 राहु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु शनिवार का दिन, राहु के नक्षत्र (आर्द्रा, स्वाती, शतभिषा) तथा शनि की होरा में अधिक शुभ होते है।
केतु
1 भिखारी को दो रंग का कम्बल दान देना चाहिए।
2 नारियल में मेवा भरकर भूमि में दबाना चाहिए।
3 बकरी को हरा चारा खिलाना चाहिए।
4 ऊँचाई से गिरते हुए जल में स्नान करना चाहिए।
5 घर में दो रंग का पत्थर लगवाना चाहिए।
6 चारपाई के नीचे कोई भारी पत्थर रखना चाहिए।
7 किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल अपने घर में लाकर रखना चाहिए।
8 केतु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु मंगलवार का दिन, केतु के नक्षत्र (अश्विनी, मघा) एवं शनि की होरा में अत्यंत फलीभूत होते है।


गायत्री जयंती


गायत्री मां से ही चारों वेदों की उत्पति मानी जाती हैं। इसलिये वेदों का सार भी गायत्री मंत्र को माना जाता है। मान्यता है कि चारों वेदों का ज्ञान लेने के बाद जिस पुण्य की प्राप्ति होती है अकेले गायत्री मंत्र को समझने मात्र से चारों वेदों का ज्ञान मिलता जाता है।

कौन हैं गायत्री?

चारों वेद, शास्त्र और श्रुतियां सभी गायत्री से ही पैदा हुए माने जाते हैं। वेदों की उत्पति के कारण इन्हें वेदमाता कहा जाता है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की आराध्य भी इन्हें ही माना जाता है इसलिये इन्हें देवमाता भी कहा जाता है। माना जाता है कि समस्त ज्ञान की देवी भी गायत्री हैं इस कारण ज्ञान-गंगा भी गायत्री को कहा जाता है। इन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। मां पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी की अवतार भी गायत्री को कहा जाता है।

कैसे हुआ गायत्री का विवाह?

कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्मा यज्ञ में शामिल होने जा रहे थे। मान्यता है कि यदि धार्मिक कार्यों में पत्नी साथ हो तो उसका फल अवश्य मिलता है लेकिन उस समय किसी कारणवश ब्रह्मा जी के साथ उनकी पत्नी सावित्रि मौजूद नहीं थी इस कारण उन्होंनें यज्ञ में शामिल होने के लिये वहां मौजूद देवी गायत्री से विवाह कर लिया। उसके पश्चात एक विशेष वर्ग ने देवी गायत्री की आराधना शुरु कर दी।

कैसे हुआ गायत्री का अवतरण?

माना जाता है कि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी पर गायत्री मंत्र प्रकट हुआ। मां गायत्री की कृपा से ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र की व्याख्या अपने चारों मुखों से चार वेदों के रुप में की। आरंभ में गायत्री सिर्फ देवताओं तक सीमित थी लेकिन जिस प्रकार भगीरथ कड़े तप से गंगा मैया को स्वर्ग से धरती पर उतार लाये उसी तरह विश्वामित्र ने भी कठोर साधना कर मां गायत्री की महिमा अर्थात गायत्री मंत्र को सर्वसाधारण तक पंहुचाया।

कब मनाई जाती है गायत्री जयंती?

गायत्री जयंती की तिथि को लेकर भिन्न-भिन्न मत सामने आते हैं। कुछ स्थानों पर गंगा दशहरा और गायत्री जयंती की तिथि एक समान बताई जाती है तो कुछ इसे गंगा दशहरे से अगले दिन यानि ज्येष्ठ मास की एकादशी को मनाते हैं। वहीं श्रावण पूर्णिमा को भी गायत्री जयंती के उत्सव को मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन गायत्री जयंती को अधिकतर स्थानों पर स्वीकार किया जाता है। लेकिन अधिक मास में गंगा दशहरा अधिक शुक्ल दशमी को ही मनाया जाता है जबकि गायत्री जयंती अधिक मास में नहीं मनाई जाती।

गायत्री की महिमा:

गायत्री की महिमा में प्राचीन भारत के ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक भारत के विचारकों तक अनेक बातें कही हैं। वेद, शास्त्र और पुराण तो गायत्री मां की महिमा गाते ही हैं।

अथर्ववेद में मां गायत्री को आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली देवी कहा गया है।

महाभारत के रचयिता वेद व्यास कहते हैं गायत्री की महिमा में कहते हैं जैसे फूलों में शहद, दूध में घी सार रूप में होता है वैसे ही समस्त वेदों का सार गायत्री है। यदि गायत्री को सिद्ध कर लिया जाये तो यह कामधेनू (इच्छा पूरी करने वाली दैवीय गाय) के समान है। जैसे गंगा शरीर के पापों को धो कर तन मन को निर्मल करती है उसी प्रकार गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र हो जाती है।

गायत्री को सर्वसाधारण तक पहुंचाने वाले विश्वामित्र कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाला गायत्री मंत्र निकाला है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला मंत्र और कोई नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से गायत्री का जप करता है वह पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे केंचुली से छूटने पर सांप होता है।

गायत्री जयन्ती मनाई जाती है। गायत्री लाखों और करोड़ों हिन्दुओं का इष्ट है। यह हमारे जीवन का सब से आवश्यक तत्व है, प्रकाश स्तम्भ है, अज्ञानान्धकार में भटकने वालों को मार्गदर्शन करता है, संसार सागर में डुबकियाँ लगाने वालों को बचाकर पार लगा देता है, प्राणी इस संसार के गोरखधंधे से घबरा जाता है तो मानो अपने प्रिय पुत्र पर वरद हस्त फेर कर उसे साँत्वना देता है, मनुष्य जगत की ठोकरों से तंग आ जाता है तो उसे धैर्य और सहन शक्ति प्रदान करता है ताकि वह कष्ट और कठिनाईयों के बीच भी हंसता रहे, मृत्यु भी सामने आए तो उस से भी संघर्ष करने की ठान ले। गायत्री माता इतनी दयालु हैं कि वह अपने पुत्र का दुःख सहन नहीं कर सकती और उसे दुःख से सुख, अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य की ओर ले जाती है। उसके त्रितापों को नष्ट कर देती है। उसके अभावों का दूर करती है लौकिक और पारलौकिक सब प्रकार की उन्नति में सहायक सिद्ध होती है। मनुष्य को मनुष्य बनना सिखाती है। उसे अपने पारिवारिक व सामाजिक कर्तव्यों का ज्ञान कराती है ताकि वह पथभ्रष्ट न जाए। दुष्ट, कुकर्मी, ठग, चोर, बेईमान, व्यसनी, छली, कपटी, स्वार्थी व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लाने का यह अमोध अस्त्र है जो हजारों और लाखों बार आजमाया हुआ है।

गायत्री मन्त्र देखने में तो बहुत छोटा सा 24 अक्षरों का मन्त्र दीखता है परन्तु इसमें गजब शक्ति है। हृदय परिवर्तन की यह रामबाण औषधि है। इससे अनेक प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसमें अनेक प्रकार की विद्याओं का संकेत मिलता है। इसमें वह तत्व ज्ञान भरा पड़ा है जिसे अपनाकर मनुष्य अजर-अमर हो जाता है। इसके एक-एक अक्षर में वह शिक्षाएं भरी पड़ी हैं जिसे अपने जीवन में उतार कर मनुष्य धन्य हो सकता है।

यही कारण है कि आदि काल से ऋषियों ने इस परम पुनीत मंत्र को अपनाया है और इसके बिना जल ग्रहण न करने का आदेश दिया है। इसका चमत्कार प्रभाव उन्होंने अनुभव कर लिया था तभी बच्चों के थोड़ा समझदार होते ही इसकी दीक्षा दे देते हैं, और उसे जीवन भर धारण किए रहने की शिक्षा देते हैं कि इसी के सहारे अपनी जीवन नाव पार करना। जो मनुष्य इतने महान, प्रेरणादायक और कल्याण कारी तत्व को भूल जाता है, वह पतन के मार्ग पर चलना आरम्भ कर देता है।

गायत्री माता के चार पुत्र चार वेद हैं। गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या स्वरूप चार वेद बने हैं। इस महामन्त्र का जो अर्थ और रहस्य है, उसका प्रकटीकरण चारों वेदों में ही हुआ है। बीज रूप में जो गायत्री में है, वह विस्तार से वेदों में है। वेद को ईश्वरीय ज्ञान माना जाता है। यह पवित्र हृदय ऋषियों के स्वच्छ, अन्तःकरणों में अवतरित हुआ था। गायत्री की घोर तपश्चर्या करके ही वह इसकी सामर्थ्य प्राप्त कर सके थे, गायत्री के मन्थन का यह परिणाम था। गायत्री हमारी भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। वेद में भी दोनों प्रकार के विषय हैं। यह ज्ञान और विज्ञान का भण्डार हैं। इसने मनुष्य जाति को सब प्रकार की विद्याओं का विज्ञान दिया है, इसने उस की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान किया है। यह वह अमृत है जिसे पीकर उसके आन्तरिक नेत्र खुल जाते हैं, उसे वास्तविकता का ज्ञान होता है, उसके मनः क्षेत्र में ज्ञान का उदय होता है, वह अपने और समाज के जीवन को सत्पथ पर ले जाता है।

परन्तु खेद की बात है कि हम अपने अमूल्य रत्नों को भूल गए। हमारे स्वार्थों ने हमें इन से अलग कर दिया। फलस्वरूप इस जीवन विद्या से वंचित रहने लगे। दीपक के अभाव से जैसे मनुष्य अंधेरे में ठोकरें खाता है। हम भी दिन-दिन अवनति की ओर जाने लगे। जिन लोगों ने इन्हें अपनाया वह इनसे यथेष्ट लाभ उठा चुके हैं और उठा रहे हैं।

अभी तक वेद विद्या को सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाने के लिए दो कठिनाइयाँ सामने आ रही थी। एक तो यह कि जो हिन्दी भाष्य उपलब्ध थे, उनके अर्थ इस प्रकार से किए गए थे कि उनको समझना कठिन था और दूसरी यह कि उनका मूल्य इतना अधिक रखा गया था कि वह साधारण व्यक्तियों कि लिए खरीदना सम्भव न था। गायत्री तपोभूमि ने इन दोनों कठिनाईयों को दूर करने का प्रयत्न किया है। परम पूज्य प्रातः स्मरणीय वेद पूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य जी महाराज ने चारों वेदों का सरल भाष्य इस ढंग से किया है कि उसे कोई हिन्दी पढ़ा लिखा व्यक्ति भी पढ़ और समझ सके। दूसरे उसका मूल्य इतना कम रखा गया है कि उसे हर एक व्यक्ति गरीब, अमीर खरीद सकता है। ऋग्वेद की 1, अथर्व वेद की 2, यजुर्वेद की 3 और साम वेद की 4

गायत्री जयंती के दिन गायत्री माता का गुण गान गाया जाता है, घर-घर में उसके व्यापक प्रचार के संकल्प किए जाते हैं, सभा, आयोजन, यज्ञ और जुलूस निकाले जाते हैं ताकि अग्नि पर पड़ी राख की भाँति यदि गायत्री विद्या का हमारे जीवन से लोप हो गया हो तो, हम उसे पुनः स्मरण करें और अपने जीवन में चरितार्थ करें। माँ अपने पुत्रों को अपनी छाती से अलग नहीं कर सकती। उसे उन्हें चिपकाए रहने में ही प्रसन्नता अनुभव होती है। गायत्री जयन्ती को वेद जयन्ती भी मानना चाहिए। इस दिन गायत्री परिवार की प्रत्येक शाखा में वेद भगवान की स्थापना हो। प्रदर्शन से उसकी व्यापक जानकारी होती है। वेद भगवान के जुलूस निकाले जाएँ जिस तरह सिख लोग गुरु ग्रन्थ साहब की पूजा पर्व पर करते हैं। वेद भगवान का जय-जय कार हो लाखों हिन्दुओं ने अभी तक वेद भगवान के दर्शन तक न किए होंगे। गाजे बाजे, कीर्तन आदि के साथ निकले जुलूस का जनता पर एक छाप पड़ेगी कि वेद भारतीय संस्कृति के विकास का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। स्वस्तिवाचन, हवन, भजन आदि के साथ सुन्दर चाँदी के सिंहासन पर वेद भगवान की स्थापना करनी चाहिए। वेद कथा का प्रबन्ध करना चाहिए। सभा और सम्मेलन करके वेद भगवान की महत्ता हिन्दु जगत पर स्थापित करनी चाहिए ताकि हम और उनका आकर्षण बढ़े और हमारा राष्ट्र दिन-दिन नैतिक व साँस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर बढ़े।

इसी दिन गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस दिन तप की प्रतिमूर्ति भागीरथ ने गंगा का अवतरण किया था। घोर तप के फलस्वरूप ही वह प्यासी जनता को तृप्त कर सके थे। भागीरथ की आत्मा हमें पुकार-पुकार कर कह रही है केवल योजनाओं और बातों से काम न चलेगा वरन् काम के लिए कमर कसनी होगी और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने जीवनों को खपाना होगा तभी गंगा प्रसन्न होगी और मुँह माँगा वरदान देंगी। अनैतिकता झूठ, छल, कपट, बेईमानी, नास्तिकता, लोभ, स्वार्थीपन, अन्धविश्वास के इस युग में ज्ञान गंगा को अवतरित करने के लिए घोर परिश्रम करना होगा। गायत्री माता को घर-घर पहुँचाने के लिए परिजनों को जो कष्ट मुसीबतें और संघर्षों का सामना करना पड़ा वैसे ही समय परिश्रम और तप की बलि अब भी देनी होगी। एक शाखा में एक वेद की स्थापना तो सरल है। कुछ सदस्य मिलकर इस कार्य को कर सकते हैं गाँव मुहल्ले से चन्दा इकट्ठा कर सकते हैं। परन्तु यहाँ तक हमें सीमित नहीं रहना है। हमें तो सारे विश्व को वेद ज्ञान ने सींचना है। संसार में वेदों की धूम मचा देनी है और एक बार फिर दिखा देना है कि भारत जगतगुरु है और सारे विश्व को अध्यात्म ज्ञान देने का अधिकारी है, वह सबका नेतृत्व करेगा और वेदों की अद्वितीय महत्ता को और स्थापना करेगा। गायत्री का न अक्षर हमें यह शिक्षा देता है कि जो कुछ तुम्हारे पास है परहित के लिए लुटा दो। अपने पास कुछ मत रखो। वेद सृष्टि का आदि ज्ञान है। हमें इस बीज को सब ओर बखेर देना हैं ताकि उससे सुन्दर फल देने वाले कल्याणकारी और शान्तिदायक पेड़ उगे और उसकी छाया में बैठकर विश्व सुख और समृद्धि का अनुभव करे।

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

गायत्री मंत्र से सभी सनातनी लोग भली-भांती परिचित होते हैं। बचपन में स्कूल के दिनों से ही इस मन्त्र का जाप शुरू करवा दिया जाता है और जीवन के अंतिम पड़ाव ‘बुढ़ापे’ तक यह जप चलता रहता है। हिन्दू धर्म का सबसे सरल मन्त्र यही है और वेदों में इस मन्त्र को ईश्वर की प्राप्ति का मन्त्र बताया गया है।

यजुर्वेद के मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः और ऋग्वेद के छंद 3. 62. 10 के मेल से गायत्री मन्त्र का निर्माण हुआ है। इस मंत्र में सवित्र देव की उपासना है, इसलिए इसे सावित्री भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसके उच्चारण और इसे समझने से ईश्वर की प्राप्ति होती है।

गायत्री मन्त्र का शाब्दिक अर्थ

ॐ - सर्वरक्षक परमात्मा

भू: - प्राणों से प्यारा

भुव: - दुख विनाशक

स्व: - सुखस्वरूप है

तत् -उस

सवितु: - उत्पादक, प्रकाशक, प्रेरक

वरेण्य - वरने योग्य

भुर्ग: - शुद्ध विज्ञान स्वरूप का

देवस्य - देव के

धीमहि - हम ध्यान करें

धियो - बुद्धियों को

य: - जो

न: - हमारी

प्रचोदयात - शुभ कार्यों में प्रेरित करें।
भावार्थ : उस सर्वरक्षक प्राणों से प्यारे, दु:खनाशक, सुखस्वरूप श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें तथा वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।

गायत्री मन्त्र का लाभ...गायत्री मंत्र के निरंतर जाप से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। यदि घर का कोई सदस्य बीमार है या घर में सुख-शांति नहीं आ रही है तो प्रतिदिन घंटा-आधा घंटा इस मन्त्र का जाप किया जाए। बीमार व्यक्ति को दवा देने से पहले, (व्यक्ति के पास बैठकर एवं दवा को हाथ में लेकर) इस मन्त्र के जाप से लाभ प्राप्त हो सकता है। दैवीय कृपा प्राप्त करने और धन प्राप्त करने के लिए भी यह मन्त्र शुभ बताया गया है

अगर आप विद्यार्थी हैं तो इस मन्त्र के जाप से आपकी स्मरण शक्ति भी बढ़ सकती है। ब्रह्मचार्य की रक्षा के लिए भी गायत्री मन्त्र उपयोगी बताया गया है। अब क्योकि इस मन्त्र की शुरुआत ही ॐ से होती है तो मस्तिष्क के शान्ति के लिए यह मन्त्र अच्छा रहता है। आप बेशक किसी भी ईष्ट देव की पूजा करते हैं, पूजा के प्रारंभ में आप गायत्री मन्त्र का जाप कर सकते हैं। यह शुरूआती बीज मन्त्र भी माना जाता है। ध्यान रखें कि गायत्री मंत्र का जाप हमेशा रुद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए



निर्जला एकादशी



एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला-एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।

निर्जला एकादशी का महत्त्व
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।
हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहाँ तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

निर्जला एकादशी पूजा
इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है। इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है। एकादशी के दिन सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें। पश्चात् 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करे। इस दिन व्रत करने वालों को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। तदोपरान्त नियमानुसार नारायण कवच का पाठ करें। पाठ के बाद भगवान नारायण की आरती करें।
विधि – उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जाय | तत्पश्चात ३ वार आचमन करके आसन एवं देह की शुद्धि करके ॐ ॐ नमः पादयोः |ॐ नं नमो जान्वोः | ॐ मों नमः ऊर्वो:| ॐ नां नमः उदरे |ॐ रां नमो हृदि | ॐ यं नमो उरसि | ॐ णां नमो मुखे | ॐ यं नमः शिरसि |

ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्यां, ॐ नं नमो दक्षिणमध्यमायां ,ॐ मों नमो दक्षिणानामिकायां, ॐ भं नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम्| ॐ गं नमो वामकनिष्ठिकायाम्, ॐ वं नमो वामानामिकायाम्, ॐ तें नमो वाममध्मायाम्, ॐ वां नमो वामतर्जन्याम्, ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ दें नमो दक्षिणांगुष्ठाधःपर्वणि, ॐ वां नमो वामान्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ यं नमो वामान्गुष्ठाधः पर्वणि –

इन मंत्रो से तत्तदंगों में न्यास करके निम्नलिखित मन्त्र से दिग्बन्धन करें

ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ,ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेय्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् नैर्ऋत्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् प्र्तीच्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् कौबेर्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् ईशान्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम्,ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम्,

नारायणकवचम् ॥
राजोवाच ।
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥1॥

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥2॥
श्रीशुक उवाच ।
वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥3॥

विश्वरूप उवाच ।
धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः ।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥4॥

नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते ।
दैवभूतात्मकर्मभ्यो नारायणमयः पुमान् |
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥5॥

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥6॥

करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ॥7॥

न्यसेद्धृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥8॥

वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥9॥

सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥10॥

आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥11॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥12॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥13॥

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः ।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥14॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥15॥

मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥16॥

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥17॥

धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्या-
द्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा ।
यज्ञश्च लोकादवताञ्जनान्ता-
द्बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ॥18॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधा-
द्बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात् ।
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥19॥

मां केशवो गदया प्रातरव्या-
द्गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः ।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥20॥

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा
सायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥21॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः
प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः ।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥22॥

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥23॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-भूतग्रहांश गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥24॥

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ-
पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् ।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो
भीमस्वनोऽरेहृदयानि कम्पयन् ॥25॥

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-
मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि ।
चक्षूंषि

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